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राष्ट्रपति को बिल पर हस्ताक्षर करने की इतनी जल्दबाजी क्यों?

  • Writer: MOBASSHIR AHMAD
    MOBASSHIR AHMAD
  • Apr 16, 2025
  • 5 min read

लोकसभा और राज्यसभा में बिल पास होने के बाद देश की राष्ट्रपति महामहिम द्रौपदी मुर्मू ने वक्फ बिल जिसे उम्मीद नाम दिया गया है उस पर अपना हस्ताक्षर कर दिया है। वक्फ बिल क़ानून का रूप ले चुका है। देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र की मोदीं सरकार इसको कब से लागू करती है। क्या बिहार विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर इसे कुछ महीनो के लिए टाला जाता है या चुनाव से पहले इसे लागू कर दिया जाता है। जानकारी के अनुसार वक्फ बिल पर मैडम राष्ट्रपति ने पांच अप्रैल 2025 को ही हस्ताक्षर कर दिया और इसके अगले दिन अर्थात जिस दिन रामनवमी का पर्व था उस दिन गैजेट आफ इंडिया में नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया। हालांकि अधिकांश समय जब कभी राष्ट्रपति जी के पास कोई बिल जाता है तो वह अमूमन हस्ताक्षर कर देते हैं लेकिन जिस तरह से इस बिल के पास होने के बाद मुस्लिम समाज के लोगों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है और सुप्रीम कोर्ट में इस बिल के खिलाफ याचिकाएं दर्ज करवाई जा रही है उसको देखते हुए मैडम राष्ट्रपति को थोड़ा वक्त लेना चाहिए था। अब उन्होंने साइन कर दिया है तो कोई इफ बट की गुंजाइश नहीं बचती है।



हालांकि कानून के जानकारों का कहना है कि अगर मैडम राष्ट्रपति ने बिल पर हस्ताक्षर कर भी दिया है और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बिल में संवैधानिक उल्लंघन पाया जाता है तो सुप्रीम कोर्ट के पास अधिकार है कि बिल को वह रद्द कर सके। हालांकि केंद्र की मोदी सरकार ने बिल लाया है तो उसने भी कानून का हर पहलू देखा होगा औरं परखा होगा। कानून के जानकारों से सलाह मशवरा लिया होगा। इसीलिए उम्मीद बहुत कम है लेकिन अब तक सुप्रीम कोर्ट में पांच से अधिक याचिकाएं दर्ज हो चुकी है। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट सभी मामलों को एक करके सुनवाई करता है या अलग-अलग।


किसान आंदोलन की तरह बड़ा आंदोलन करना होगा तभी बिल रिजेक्ट होगा

पटना निवासी सीमाब अख्तर कहते हैं कि देखिए साल 2014 के बाद से जब से केंद्र में मोदी जी की सरकार बनी है तब से लगातार मुसलमान को टारगेट किया जा रहा है। कभी धारा 370 के नाम पर तो कभी तीन तलाक के नाम पर। हमने कई ऐसे मामले देखे हैं जब मुस्लिम समाज के लोगों का खुलेआम मॉब लिंचिंग तक किया गया। विडंबना तो यह है कि देश के प्रधानमंत्री कहते हैं कि इन लोगों को कपड़े से पहचानिए और यह लोग आएंगे तो आपके मंगलसूत्र तक छीन लेंगे। अब ऐसे प्रधानमंत्री और उनकी सरकार पर मुस्लिम समाज के लोग कैसे विश्वास कर सकते हैं। अगर देश के प्रधानमंत्री मुसलमान समाज के इतने हित चिंतक हैं तो जिस तरह से वक्फ बोर्ड में दो गैर मुसलमान सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान किया गया है इस तरह अयोध्या का राम मंदिर हो या पटना का महावीर मंदिर। काशी का विश्वनाथ मंदिर हो या मथुरा का मंदिर।



इन सभी मंदिरों में भी मुसलमान सदस्यों को जगह दिया जाना चाहिए। लेकिन आप ऐसा करेंगे नहीं। क्योंकि आपको अपना धर्म प्यारा है। जिस तरह से आपको अपना धर्म प्यारा है इस तरह से हमें भी अपना धर्म प्यारा है। यह सच है कि लोकसभा और राज्यसभा में चर्चा के बाद बिल पास हो चुका है और मैडम राष्ट्रपति ने इस पर अपना हस्ताक्षर भी कर दिया है। अब मुस्लिम समाज के लोगों को शांति से काम लेना होगा। जिस तरह देश के किसानों ने एक लंबा आंदोलन किया और इसके बाद केंद्र की मोदी सरकार ने किसान बिल को वापस लिया कुछ ऐसा ही मुस्लिम समाज के लोगों को भी करना होगा। हां अभी या ध्यान रखना है कि आंदोलन को बिल्कुल शांतिपूर्ण तरीके से चलाया जाए नहीं तो बीजेपी वालों का जो एजेंडा है वह अपने आप पूरा हो जाएगा। वे लोग तो चाहते ही हैं कि हम लोग सड़क पर उतरे और कुछ ऐसा वैसा कर बैठे जिससे उनका चुनाव में लाभ हो। देश बुरे दौड़ से गुजर रहा है हम सबको मिलकर काम करना होगा। सीमाब, अख्तर बताते हैं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस बाबत आंदोलन करने का ऐलान कर दिया है।


वक्फ कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची जमीयत उलेमा ए हिंद


जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी है। मदनी ने एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड आकांक्षा राय, गुरनीत कौर, इबाद मुश्ताक और फुजैल अहमद अब्यूबी के जरिए सुप्रीम कोर्ट में वक्फ संशोधन कानून 2025 को चुनौती देने वाली याचिका दायर की है। वहीं 7 अप्रैल को आरजेडी ने भी इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी है।


बिल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे किशनगंज के कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद

वक्फ बिल पास होने के बाद इस बिल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जो सबसे पहली याचिका लगाई गई वह बिहार के किशनगंज से कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद का था, इसके बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल, एआइएमआइएम नेता असदुद्दीन ओवैसी, पूर्व जदयू विधायक मुजाहिद आलम, कोचाधामन से राजद विधायक इजहार अशफी इसके अतिरिक्त कई और लोग हैं जो इस बिल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं।



सबसे पहले यह जान लेते हैं कि किशनगंज से कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने जो सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दर्ज करवाई है उसमें उन्होंने क्या कहा है। याचिका में कहा गया है कि ये बिल मुसलमानों के अधिकारों के साथ भेदभाव करने वाला है। इसके साथ ही ये संशोधन विधेयक संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत समानता के अधिकार, अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धर्म और धार्मिक गतिविधियों के पालन और प्रबंधन का अधिकार, अनुच्छेद 29 में दिए गए अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा का हनन करता है।


याचिका में ये भी कहा गया है कि वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना में संशोधन कर वक्फ प्रशासनिक निकायों में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना अनिवार्य किया गया है। ऐसा करना धार्मिक शासन में अनुचित हस्तक्षेप है। इसके विपरीत हिंदू धार्मिक न्यास विभिन्न राज्य अधिनियमों के तहत और विशेष रूप से हिंदुओं द्वारा प्रबंधित किए जाते हैं। कांग्रेस सांसद जावेद ने अपनी अर्जी में कहा कि यह चयनात्मक हस्तक्षेप, अन्य धार्मिक संस्थानों पर समान शर्तें लगाए बिना किया गया है। लिहाजा ये एकतरफा और मनमाना वर्गीकरण है, ये अनुच्छेद 14 और 15 का सीधा-सीधा उल्लंघन है।


वक्फ बिल के खिलाफ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, चिट्ठी जारी कर कहा हम आंदोलन करेंगे


ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) वक्फ संशोधन बिल को वापस लेने की मांग के साथ पूरे देश में आंदोलन करेगा। इस बाबत AIMPLB मे दो पेज का लेटर भी जारी किया गया है। AIMPLB ने कहा- हम सभी धार्मिक, समुदाय-आधारित और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन करेंगे। यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक कि संशोधन पूरी तरह से निरस्त नहीं हो जाते। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा-वक्फ संशोधन बिल इस्लामी मूल्यों, धर्म और शरीयत, धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता, सांप्रदायिक सद्भाव और भारतीय संविधान के आधारभूत ढांचे पर गंभीर हमला है। कुछ राजनीतिक दलों का भाजपा के सांप्रदायिक एजेंडे को दिए गए समर्थन ने उनके तथाकथित प्रर्मनिरपेक्ष मुखौटे को पूरी तरह से उजागर कर दिया है।


ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की तरफ से राष्ट्रपति को एक पत्र भी लिखा गया है जिसमें कहा गया है कि यह अधिनियम पूरी तरह से असंवैधानिक है और देश के मुसलमानों पर हमला है। AIMPLB ने कहा, 'हमारा मानना है कि अधिनियम के प्रावधानों पर गंभीरता से पुनर्विचार की आवश्यकता है क्योंकि वे भारत के संविधान के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों के साथ असंगत हैं, विशेष रूप से धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और धार्मिक संस्थानों की सुरक्षा के संबंध में।' मुस्लिम संगठन ने कहा, 'मामले की गंभीरता को देखते हुए, हम आपसे विनम्र अनुरोध करते हैं कि कृपया हमें आपके लिए सुविधाजनक समय पर शीघ्र नियुक्ति प्रदान करें ताकि हम अपनी चिंताओं को प्रस्तुत कर सकें और संवैधानिक ढांचे के भीतर संभावित समाधानों पर चर्चा कर सकें।'

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