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टेढ़ागाछ में मानसून की पहली मार: सुहिया रेतुआ नदी उफान पर, चंदे से बना चचरी पुल बहने से 50 हजार लोगों का संपर्क टूटा

mdkashif3300
Jun 15
3 min read







टेढ़ागाछ में सुहिया रेतुआ नदी के उफान में बहा चचरी पुल, चिल्हनियां समेत दर्जनों गांवों की 50 हजार की आबादी मुख्य मार्ग से कटी


टेढ़ागाछ (किशनगंज):

बिहार के सीमांचल इलाके में मानसून की दस्तक के साथ ही सीमावर्ती और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ गई हैं। नेपाल के तराई क्षेत्रों तथा सीमांचल के स्थानीय इलाकों में हो रही लगातार भारी बारिश के कारण किशनगंज जिले के टेढ़ागाछ प्रखंड से होकर गुजरने वाली सुहिया रेतुआ नदी उफान पर है। नदी के जलस्तर में हुई अचानक वृद्धि और तेज बहाव के कारण सोमवार सुबह चिल्हनियां पंचायत के सुहिया घाट पर बना बांस-बल्ले का अस्थायी चचरी पुल ताश के पत्तों की तरह ढहकर नदी में बह गया। चचरी पुल के बह जाने से लगभग 50 हजार की विशाल ग्रामीण आबादी का जिला मुख्यालय और मुख्य मार्गों से सीधा संपर्क पूरी तरह से टूट गया है।


ग्रामीणों के आपसी सहयोग और चंदे से बना था पुल

स्थानीय ग्रामीणों ने रोष व्यक्त करते हुए बताया कि पानी के तेज बहाव में बहा यह पुल किसी सरकारी विभाग या योजना के द्वारा नहीं बनाया गया था। बल्कि चिल्हनियां और आसपास के गांवों के लोगों ने आपस में चंदा इकट्ठा कर और शारीरिक श्रमदान कर इस बांस के अस्थायी चचरी पुल का निर्माण किया था। ग्रामीणों की कोशिश थी कि बरसात के दिनों में उनकी दैनिक जरूरतें प्रभावित न हों और उनका आवागमन बना रहे। लेकिन मानसून की इस पहली बड़ी बारिश और नदी के उग्र रूप के आगे यह कमजोर ढांचा नहीं टिक सका और देखते ही देखते नदी की तेज धार में समा गया।


दर्जनों गांवों के लोगों की बढ़ी परेशानी, जान जोखिम में डालकर नाव का सहारा

चचरी पुल टूटने के कारण चिल्हनियां, हवाकोल, मियांपुर, दुर्गापुर, बैगना, चौरी, मटियारी, कलियागंज और झाला सहित करीब 15 गांवों के लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। अब इन गांवों के लोगों के पास नदी पार करने के लिए केवल नाव ही एकमात्र सहारा बची है। ग्रामीण हर दिन छोटी-छोटी नावों में अपनी क्षमता से अधिक संख्या में बैठकर और जान जोखिम में डालकर नदी पार करने को मजबूर हैं, जिससे किसी भी दिन बड़ा हादसा हो सकता है।


आजादी के बाद से पक्के पुल की आस अधूरी

स्थानीय चिल्हनियां पंचायत के मुखिया मोफत लाल ऋषिदेव ने बताया कि आजादी के दशकों बाद भी सुहिया रेतुआ नदी के इस महत्वपूर्ण घाट पर पक्के स्थायी पुल का निर्माण नहीं कराया जा सका है। उन्होंने कहा, "हमने इस पुल के लिए क्षेत्रीय सांसद, विधायक और जिला प्रशासन को दर्जनों बार लिखित आवेदन देकर मांग उठाई है, लेकिन हर बार हमें केवल झूठे आश्वासन ही मिले। पक्का पुल न होने का खामियाजा अब हमारे इलाके के लोगों को अगले पांच-छह महीनों तक भुगतना पड़ेगा, जब तक कि नदी का जलस्तर सामान्य नहीं हो जाता।"


गर्भवती महिलाओं, मरीजों और किसानों के सामने गंभीर संकट

पुल टूटने के बाद सबसे कठिन स्थिति गंभीर मरीजों और गर्भवती महिलाओं की है। आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस या गाड़ियां नदी के दूसरे किनारे पर ही खड़ी रह जाती हैं और मरीजों को खाट या चारपाई पर लिटाकर नदी पार कराना पड़ता है। समय पर चिकित्सा सहायता न मिलने के कारण कई बार मरीजों की स्थिति बिगड़ जाती है। इसके अलावा, स्कूली बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और किसानों के द्वारा उपजाए गए अनाज व हरी सब्जियों को मुख्य बाजार तक ले जाने की व्यवस्था भी ठप पड़ गई है, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने सरकार और बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग व ग्रामीण कार्य विभाग से अविलंब सुहिया रेतुआ नदी पर एक पक्के आरसीसी पुल (RCC Bridge) के निर्माण की मांग की है।

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