किशनगंज का गौरव ‘सुरजापुरी आम’ उपेक्षा का शिकार: स्वाद में मक्खन जैसा बेजोड़, फिर भी सरकारी संरक्षण से दूर
- mdkashif3300
- Jun 12
- 3 min read
अनोखी विशेषता: पूरी तरह से रेशा-रहित (fiberless) और मक्खन की तरह मुलायम गूदा, जिसे ब्रेड-रोटी पर लगाकर खाया जाता है।
ऐतिहासिक पहचान: पुराने समय में 'परगना सुरजापुरी' कहलाने वाले सीमांचल क्षेत्र के नाम पर पड़ा 'सुरजापुरी आम'।
संकट में बाग: सरकारी उपेक्षा, जलवायु परिवर्तन और कीटों के प्रकोप से नष्ट हो रहे बाग, किसान पेड़ों को काटने पर मजबूर।
मांग: सुरजापुरी आम को जीआई टैग दिलाने और सरकारी नर्सरियों में इसकी कलमों को 30% हिस्सेदारी देने की उठ रही मांग।

किशनगंज: किशनगंज जिले में फलों का राजा आम अपनी सैकड़ों किस्मों के लिए मशहूर है, लेकिन सीमांचल की धरती पर उगने वाला पारंपरिक ‘सुरजापुरी आम’ स्वाद, सुगंध और गुणवत्ता के मामले में एक अलग ही पहचान रखता है। बिहार के किशनगंज, पूर्णिया तथा पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर की बलुई-दोमट मिट्टी और अनुकूल जलवायु में पैदा होने वाला यह आम अपने अनोखे स्वाद के लिए दशकों से लोगों की पहली पसंद रहा है। बावजूद इसके, आज तक इसे न तो जीआई टैग (Geographical Indication Tag) मिल पाया और न ही वह सरकारी संरक्षण, जिसका यह वास्तविक हकदार है।
मक्खन जैसा मुलायम गूदा और रेशारहित स्वाद
स्थानीय किसानों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, सुरजापुरी आम की सबसे बड़ी विशेषता इसका पूरी तरह रेशारहित और बेहद मुलायम गूदा है। इसका स्वाद इतना लाजवाब होता है कि कई लोग इसे मक्खन की तरह ब्रेड और रोटी पर लगाकर खाते हैं। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत के बाजारों में इसकी भारी मांग रहती है।
पकने के बाद सड़ता नहीं, धीरे-धीरे सूखता है
सुरजापुरी आम की एक अनोखी खूबी इसे अन्य किस्मों से अलग बनाती है। आमतौर पर पके हुए आम कुछ दिनों बाद गलने या सड़ने लगते हैं, लेकिन सुरजापुरी आम पकने के बाद धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से सूखता है। किसानों का दावा है कि यही विशेषता इसे एक विशिष्ट और दुर्लभ नस्ल बनाती है।
सुरजापुरी परगना से जुड़ा है ऐतिहासिक नाम
जानकार बताते हैं कि सीमांचल का यह इलाका पुराने समय में ‘परगना सुरजापुरी’ के नाम से जाना जाता था। इसी क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर इस खास आम का नाम 'सुरजापुरी आम' पड़ा। टिकोला अवस्था (कच्चे आम) में यह आम बेहद खट्टा होता है, जिसके कारण इसकी चटनी, आम पन्ना और पारंपरिक अचार बड़े पैमाने पर बनाए जाते हैं। वहीं जून के मध्य में पूरी तरह पकने पर इसकी मिठास अन्य कई लोकप्रिय किस्मों (जैसे मालदा, बंबइया) को पीछे छोड़ देती है।

कलम तैयार करने की कोई सरकारी योजना नहीं
किसानों का आरोप है कि कृषि विभाग द्वारा हर वर्ष मालदा, बंबइया और कलकतिया जैसी किस्मों के पौधे तो वितरित किए जाते हैं, लेकिन सुरजापुरी आम की कलम तैयार करने या इसके पौधों को बढ़ावा देने के लिए कोई विशेष योजना नहीं चलाई जा रही है। ठाकुरगंज और पोठिया प्रखंड के किसानों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन के कारण मिल्ड्यू और फ्रूट फ्लाई जैसे कीटों का प्रकोप तेजी से बढ़ा है। उचित तकनीकी सलाह और सरकारी सहायता के अभाव में कई पुराने बाग नष्ट हो रहे हैं। मजबूर होकर किसान अब आम के पेड़ों की जगह व्यावसायिक लकड़ी वाले पौधे लगाने लगे हैं।
किसान संगठनों और बुद्धिजीवियों की सरकार से मांग
किसान संगठनों, पर्यावरणविदों और स्थानीय बुद्धिजीवियों ने बिहार सरकार, उद्यान निदेशालय और जिला प्रशासन से सुरजापुरी आम को बचाने के लिए विशेष संरक्षण योजना शुरू करने की मांग की है:
सरकारी नर्सरियों में सुरजापुरी आम की कलमों को प्राथमिकता दी जाए।
वृक्षारोपण योजनाओं में कम से कम 30 प्रतिशत हिस्सेदारी इस किस्म के पौधों की हो।
कृषि वैज्ञानिकों की टीम गठित कर कीटों पर शोध कराया जाए।
सुरजापुरी आम को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इस स्वदेशी और दुर्लभ आम की ब्रां
डिंग, पैकेजिंग और संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इसके अद्भुत स्वाद से वंचित रह जाएंगी। कभी सीमांचल की पहचान रहा सुरजापुरी आम केवल इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगा।
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