बिहार की शर्मसार स्वास्थ्य व्यवस्था: सीवान के मॉडल अस्पताल में नहीं मिली एम्बुलेंस, ठेले पर बच्चे का शव ले जाने को मजबूर हुए बेबस परिजन
- mdkashif3300
- 7 days ago
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बिहार की शर्मसार स्वास्थ्य व्यवस्था: सीवान के मॉडल अस्पताल में नहीं मिली एम्बुलेंस, ठेले पर बच्चे का शव ले जाने को मजबूर हुए बेबस परिजन
बिहार सरकार और स्वास्थ्य विभाग भले ही सूबे के सरकारी अस्पतालों को आधुनिक सुविधाओं से लैस 'मॉडल अस्पताल' बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बेहद भयावह और संवेदनशील है। बिहार के सीवान जिले से एक ऐसी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसने पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है और मानवता को शर्मसार कर दिया है। यहाँ एक मॉडल अस्पताल की संवेदनहीनता के कारण एक गरीब परिवार को अपने मासूम बच्चे की मौत के बाद उसका शव ले जाने के लिए न तो स्ट्रेचर नसीब हुआ और न ही सरकारी एम्बुलेंस मिल सकी। अंततः, आंसुओं में डूबे बेबस परिजनों को अपने बच्चे के शव को एक हाथ ठेले पर रखकर ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
पेट दर्द से तड़पते बच्चे की इलाज के अभाव में मौत
घटना के संबंध में प्राप्त जानकारी के अनुसार, पीड़ित परिवार अपने मासूम बच्चे को पेट में अचानक उठे तेज दर्द के कारण इलाज के लिए सीवान के स्थानीय सदर (मॉडल) अस्पताल लेकर आया था। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल पहुंचने के बाद भी डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों ने उनके बच्चे पर तुरंत ध्यान नहीं दिया। काफी देर तक इधर-उधर भटकने और सही इलाज न मिलने के कारण बच्चे की हालत लगातार बिगड़ती चली गई और अंततः इलाज के अभाव में अस्पताल परिसर में ही मासूम ने तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया। बच्चे की मौत होते ही परिजनों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और पूरे अस्पताल परिसर में चीख-पुकार मच गई।
न स्ट्रेचर मिला, न मिली शव वाहन/एम्बुलेंस
मासूम की मौत के बाद परिजनों का दुख तब और बढ़ गया जब उन्होंने अस्पताल प्रशासन से शव को घर तक ले जाने के लिए मदद मांगी। परिजनों का आरोप है कि उन्होंने ड्यूटी पर तैनात स्वास्थ्य कर्मियों और अस्पताल के अधिकारियों से शव को वार्ड से बाहर ले जाने के लिए एक स्ट्रेचर और घर तक पहुँचाने के लिए एम्बुलेंस (शव वाहन) की गुहार लगाई। लेकिन, संवेदनहीनता की हद पार करते हुए अस्पताल के कर्मचारियों ने उनकी एक न सुनी।
गरीब होने के कारण परिजन निजी एम्बुलेंस का भारी-भरकम खर्च उठाने में पूरी तरह असमर्थ थे। काफी मिन्नतें करने के बाद भी जब अस्पताल प्रशासन का दिल नहीं पसीजा, तो बेबस पिता और परिजनों ने बाहर खड़े एक सब्जी वाले या सामान ढोने वाले हाथ ठेले का सहारा लिया। उन्होंने मासूम के निर्जीव शरीर को चादर में लपेटकर ठेले पर रखा और रोते-बिलखते हुए उसे सड़क के रास्ते अपने घर की ओर ले गए।
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल, लोगों में भारी आक्रोश
शव को ठेले पर ले जाते हुए परिजनों का यह हृदयविदारक वीडियो किसी राहगीर ने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया, जो अब विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से वायरल हो रहा है। इंटरनेट पर यह वीडियो सामने आने के बाद आम नागरिकों, सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों के नेताओं का गुस्सा भड़क उठा है। लोग बिहार की उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री से सवाल पूछ रहे हैं कि क्या यही उनके दावों का 'मॉडल बिहार' और 'मॉडल अस्पताल' है? इस वीडियो ने सरकारी दावों के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया है और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
करोड़ों के बजट के बाद भी बुनियादी सुविधाओं की कमी
बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर हर साल बजट में करोड़ों रुपयों का प्रावधान किया जाता है। सीवान के इस सदर अस्पताल को भी लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके 'मॉडल अस्पताल' का दर्जा दिया गया है, ताकि गरीब मरीजों को उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें। लेकिन धरातल पर आज भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। जीवन रक्षक दवाइयों की कमी, डॉक्टरों की अनुपस्थिति, एम्बुलेंस चालकों की मनमानी और सबसे बढ़कर संवेदनहीनता ने सरकारी अस्पतालों को नरक बना दिया है। सीवान की यह घटना कोई पहली घटना नहीं है; इससे पहले भी बिहार के अलग-अलग जिलों से शव को कंधे पर, साइकिल पर या मोटरसाइकिल पर ले जाने की तस्वीरें सामने आती रही हैं।
दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग
इस बेहद दर्दनाक और शर्मनाक घटना के सामने आने के बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सीवान के जिलाधिकारी (डीएम) और सिविल सर्जन से पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि ड्यूटी पर मौजूद जिन डॉक्टरों और नर्सों की लापरवाही से बच्चे की मौत हुई, उन पर हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। साथ ही, पीड़ित परिवार को एम्बुलेंस न मुहैया कराने वाले जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों को तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले पर क्या कार्रवाई करता है या हमेशा की तरह जांच कमेटी के नाम पर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है।
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