किशनगंज : बिहार का दार्जिलिंग, 34 वर्षों की विकास यात्रा Kishanganj Growth Story | Bihar’s Darjeeling – Foundation Day Special
- PRIYANKA ROY

- Jan 5
- 2 min read
Updated: Jan 6

बिहार के सीमावर्ती जिलों में किशनगंज की पहचान हमेशा से अलग रही है। 14 जनवरी 1990 को पूर्णिया जिले से अलग होकर बने इस जिले ने 34 वर्षों में विकास, विविधता और संभावनाओं की अपनी अलग कहानी लिखी है। भौगोलिक, सांस्कृतिक और भाषाई दृष्टि से किशनगंज बिहार के अन्य जिलों से काफी अलग नजर आता है।
भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान
किशनगंज ऐसा जिला है जिस पर पश्चिम बंगाल, असम, बांग्लादेश और नेपाल का प्रभाव साफ दिखाई देता है। यही वजह है कि यहां का रहन-सहन, खान-पान और बोली-बानी बिहार के पारंपरिक स्वरूप से अलग है। यहां भोजपुरी या मैथिली से अधिक सुरजापुरी बोली बोली जाती है, जो इस इलाके की पहचान बन चुकी है।
हिमालय क्षेत्र के पास होने के कारण किशनगंज का मौसम भी खास है। साफ मौसम में यहां से कंचनजंघा पर्वत की झलक दिखाई देती है। अधिक वर्षा और हरियाली के कारण इसे “बिहार का चेरापूंजी” और “बिहार का दार्जिलिंग” भी कहा जाता है।
कृषि और चाय उत्पादन
किशनगंज की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खेती पर आधारित है। बिहार में चाय की खेती की शुरुआत यहीं से हुई थी। आज जिले में हजारों एकड़ जमीन पर चाय की खेती हो रही है।
पोठिया प्रखंड में डोंक नदी के किनारे उगाई जाने वाली हैंडमेड चाय देश-विदेश में अपनी पहचान बना चुकी है। यह चाय चीन और कोरिया जैसे देशों में ऊँचे दामों पर बिकती है और गुणवत्ता के मामले में दार्जिलिंग चाय के बराबर मानी जाती है।
जहां पहले जूट (पाट) की खेती अधिक होती थी, वहीं अब मकई और अनानास किसानों की आय का प्रमुख स्रोत बन चुके हैं।
उद्योग और विकास
किशनगंज अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण धीरे-धीरे औद्योगिक क्षेत्र के रूप में भी उभर रहा है। यहां पहले छोटे उद्योग जैसे प्लाईवुड और ईंट-भट्ठे थे, लेकिन अब बड़े उद्योगों का आगमन शुरू हो गया है।
ठाकुरगंज क्षेत्र में सीमेंट ब्लॉक यूनिट, बिस्किट फैक्ट्री और इथेनॉल फैक्ट्रियों की स्थापना हो रही है। चाय प्रोसेसिंग यूनिट्स से स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।
किशनगंज दो राष्ट्रीय राजमार्गों से जुड़ा हुआ है और इसे नॉर्थ-ईस्ट इंडिया का प्रवेश द्वार माना जाता है। रेलवे के माध्यम से भी यह जिला देश के लगभग सभी हिस्सों से जुड़ा है।
शिक्षा और चुनौतियां
एक समय शिक्षा के मामले में पिछड़ा माना जाने वाला किशनगंज अब धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में सुधार हुआ है और निजी स्कूलों की संख्या भी बढ़ी है।
हालांकि उच्च शिक्षा आज भी एक बड़ी चुनौती है। छात्रों को इंजीनियरिंग, कॉमर्स और अन्य उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना पड़ता है। जिले में कृषि विश्वविद्यालय और मेडिकल कॉलेज हैं, लेकिन कॉलेजों में सत्र विलंब की समस्या बनी हुई है।
34 वर्षों की उपलब्धि
34 वर्षों में किशनगंज ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन अपनी कृषि समृद्धि, चाय उत्पादन, सांस्कृतिक विविधता और विकास की संभावनाओं के बल पर आज यह जिला बिहार में एक अलग पहचान बना चुका है।
स्थापना दिवस के अवसर पर किशनगंज की इस विकास यात्रा पर गर्व करना स्वाभाविक है। उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में यह जिला और भी तेजी से आगे बढ़ेगा और नई ऊंचाइयों को छुएगा।
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