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भागलपुर: नाथनगर अस्पताल में प्रसव के बाद नवजात की मौत, परिजनों का आरोप- 'डॉक्टर की जगह नर्स ने कराई डिलीवरी'

  • mdkashif3300
  • 1 day ago
  • 3 min read

भागलपुर/नाथनगर: बिहार की बदहाल सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। भागलपुर जिला अंतर्गत नाथनगर रेफरल अस्पताल से एक बेहद दुखद और हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक नवजात शिशु की जन्म के कुछ ही देर बाद मौत हो गई। परिजनों का सीधा आरोप है कि डिलीवरी के समय अस्पताल में डॉक्टर मौजूद नहीं थीं, जिसके कारण नर्स ने खुद ही डिलीवरी की प्रक्रिया पूरी कराई और उचित देखभाल न मिलने के चलते नवजात की जान चली गई।



सुबह 7 बजे से ही अस्पताल में थीं पूजा, भर्ती प्रक्रिया में देरी का आरोप

प्राप्त जानकारी के अनुसार, नाथनगर के बिहारीपुर की रहने वाली पूजा कुमारी को प्रसव पीड़ा (Labor Pain) होने पर उनके परिजन उन्हें लेकर सुबह 7 बजे ही रेफरल अस्पताल पहुंचे थे। परिजनों का दावा है कि अस्पताल आने पर प्राथमिक जांच तो की गई, लेकिन मरीज को विधिवत रूप से भर्ती करने की प्रक्रिया को जानबूझकर लटकाया गया। जब पूजा की प्रसव पीड़ा असहनीय हो गई, तो वहां तैनात नर्स ने बिना किसी डॉक्टर की चिकित्सकीय निगरानी के डिलीवरी की प्रक्रिया शुरू कर दी। प्रसव के तुरंत बाद नवजात बच्ची की स्थिति बिगड़ने लगी और थोड़ी ही देर में उसकी सांसें थम गईं।


इमरजेंसी डॉक्टर और अस्पताल प्रभारी के दावों में भारी विरोधाभास

इस पूरे घटनाक्रम पर अस्पताल प्रशासन की तरफ से जो प्रतिक्रियाएं आई हैं, वे बेहद चौंकाने वाली हैं और व्यवस्था की पोल खोलती हैं:


इमरजेंसी ड्यूटी डॉक्टर का पक्ष: घटना के समय इमरजेंसी ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर अन्वेषा कुमारी का कहना है कि उन्हें इस गंभीर मरीज के बारे में कोई जानकारी समय पर नहीं दी गई। डॉक्टर ने दावा किया कि नर्सों ने डिलीवरी होने के लगभग 40 मिनट बाद उन्हें सूचित किया, जिसके चलते वे समय पर मरीज के पास नहीं पहुंच सकीं।

अस्पताल प्रभारी का पक्ष: दूसरी ओर, नाथनगर अस्पताल प्रभारी डॉ. अनुपमा सहाय का बयान बिल्कुल अलग कहानी बयां कर रहा है। प्रभारी का कहना है कि मरीज ने अस्पताल में नियमानुसार दाखिला (एडमिशन) नहीं लिया था। साथ ही उन्होंने दावा किया कि मरीज की हालत अस्पताल आने से पहले ही अत्यंत गंभीर थी। प्रभारी के अनुसार, इस पूरे मामले में डॉक्टर या नर्स की कोई गलती नहीं है।

टकराते बयानों के बीच खड़े होते गंभीर सवाल

नवजात की मौत के बाद भी जिम्मेदारी तय करने के बजाय बयानों का एक-दूसरे से टकराना कई गंभीर सवालों को जन्म देता है:


यदि मरीज सुबह 7 बजे से ही अस्पताल परिसर में मौजूद थी, तो कई घंटों तक उसकी निगरानी करने वाला कोई क्यों नहीं था?

यदि डॉक्टर अन्वेषा कुमारी ऑन-ड्यूटी थीं, तो डिलीवरी से पहले नर्सों द्वारा उन्हें तुरंत सूचना क्यों नहीं दी गई?

यदि अस्पताल प्रभारी के अनुसार मरीज की हालत पहले से गंभीर थी, तो उसे समय रहते किसी बड़े अस्पताल (जैसे JLNMCH, भागलपुर) में रेफर क्यों नहीं किया गया?

जवाबदेही से बचता सिस्टम

सरकारी अस्पतालों में अक्सर डॉक्टरों की कमी, संसाधनों की अनुपलब्धता और अतिरिक्त कार्यभार का रोना रोया जाता है। लेकिन जब एक मासूम नवजात की मौत हो जाए और पूरा तंत्र एक-दूसरे पर दोषारोपण कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने में लग जाए, तो यह केवल संसाधनों का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर संवेदनशीलता और जवाबदेही का अभाव दर्शाता है। फिलहाल, पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहा है।


सीमांचल की आवाज के लिए भागलपुर के नाथनगर से धर्मेंद्र कुमार की रिपोर्ट।



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