चुनाव के खिलाफत


कमलेश कुमार सिंह
राहुल बनें विपक्ष के सर्वमान्य नेता
क्या चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन करके राहुल गांधी नेता बन गए हैं? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि पिछले
कुछ दिनों में राहुल गांधी ने संसद के भीतर की राजनीति से आगे बढ़कर सड़कों पर विपक्षी आंदोलन का नेतृत्व करने की
कोशिश की है। इससे उनके राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव माना जा रहा है। अब यह आंदोलन तक सीमित नहीं है। सड़क
पर उतरे राहुल गांधी बड़ी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दे रहे हैं। बदली राजनीतिक तस्वीर में चुनाव आयोग और
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राहुल गांधी विपक्ष के आंदोलन में अग्रिम पंक्ति में नजर आए। संसद से
चुनाव आयोग तक मार्च, पुलिस बैरिकेडिंग के बीच विरोध प्रदर्शन और हिरासत में लिए जाने जैसी घटनाओं ने उन्हें
आंदोलन के केंद्र में ला दिया।

12 अक्टूबर को राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया और मतदाता सूची में कथित
अनियमितताओं को लेकर कानूनी हस्तक्षेप की मांग की। यह घटनाक्रम राहुल गांधी की उस राजनीतिक छवि से अलग है,
जिसमें उन्हें मुख्य रूप से संसद में सरकार को घेरते हुए देखा जाता था। ऐसे में सवाल है क्या राहुल गांधी विपक्ष के
स्वाभाविक नेता बन रहे हैं? इस आंदोलन में राहुल गांधी की भूमिका के तीन पहलू महत्वपूर्ण हैं। INDIA गठबंधन के कई
नेताओं के साथ वे लगातार विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुए। उन्होंने मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनाव आयोग की
कार्यप्रणाली पर अपने सवालों को सार्वजनिक अभियान का रूप दिया। उन्होंने इस मुद्दे को संसदीय बहस तक सीमित
रखने के बजाय सड़कों और न्यायिक मंचों पर भी उठाया। हालांकि, आंदोलन में उनकी प्रमुख भूमिका अपने आप में यह
साबित नहीं करती कि विपक्ष के सभी सहयोगी उन्हें निर्विवाद नेता स्वीकार कर चुके हैं। कुछ सहयोगी दलों के नेताओं ने
पहले विरोध मार्च के दौरान राहुल और प्रियंका गांधी की भूमिका के केंद्र में आ जाने पर आपत्ति भी जताई थी।
क्या चुनाव आयोग का मुद्दा राहुल गांधी को राजनीतिक बढ़त दे सकता है?

यहां तीन सवाल अहम हैं।
पहला-क्या मुद्दा जनता तक पहुंचा है? मतदाता सूची से नाम हटने, पात्र मतदाताओं के अधिकार और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता जैसे सवाल सीधे लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े हैं। इसलिए यह केवल कांग्रेस बनाम बीजेपी का मुद्दा नहीं, बल्कि मतदाताओं के
अधिकारों से जुड़ी बहस भी है। दूसरा-क्या विपक्ष एकजुट हुआ है? कई विपक्षी दलों का एक मंच पर आना राहुल गांधी के
लिए राजनीतिक समन्वय दिखाने का अवसर है। लेकिन इस एकजुटता को स्थायी बनाने के लिए साझा मुद्दों के साथ-साथ
गठबंधन के भीतर मतभेद को भी संभालना होगा। तीसरा-क्या आंदोलन का असर चुनावों में दिखाई देगा? यह सबसे
महत्वपूर्ण लेकिन अभी अनुत्तरित सवाल है। किसी आंदोलन में भीड़ जुटना, मीडिया में चर्चा होना और राजनीतिक
समर्थन में वास्तविक बदलाव आना तीन अलग-अलग बातें हैं। इसका आकलन जनता की प्रतिक्रिया, संगठन की सक्रियता
और आगे के चुनावी नतीजों से ही किया जा सकेगा।

बीजेपी के लिए चुनौती क्या है?
बीजेपी और चुनाव आयोग का पक्ष भी इस बहस का अहम हिस्सा है। चुनाव आयोग का कहना है कि विशेष गहन
पुनरीक्षण यानी SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना और मृत, दोहरे या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना है।
विपक्ष ने इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम हटने और अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। आयोग और बीजेपी ने
राजनीतिक पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है। इसलिए राजनीतिक चुनौती केवल विरोध प्रदर्शन का जवाब देने की
नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र मतदाताओं के अधिकार और प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़े सवालों का
तथ्यात्मक जवाब देने की भी है। राहुल गांधी के हालिया आंदोलन ने उन्हें चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी अभियान का
प्रमुख चेहरा बनाया है। सड़क पर उतरकर नेतृत्व करना उनकी राजनीतिक शैली में एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में सामने
आया है। लेकिन क्या राहुल गांधी एक बड़े जननेता के रूप में स्थापित हो गए हैं? इस निष्कर्ष पर पहुंचना अभी
जल्दबाजी होगी। उनके सामने असली चुनौती आंदोलन को लगातार चलाने से आगे की है-क्या वे इस मुद्दे को व्यापक
जनसमर्थन में बदल पाएंगे, क्या विपक्षी एकता बनाए रख पाएंगे और क्या मतदाताओं के सामने कोई ठोस राजनीतिक
विकल्प प्रस्तुत कर पाएंगे?
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