top of page

बिहार विधान परिषद चुनाव

Writer: MOBASSHIR AHMAD
MOBASSHIR AHMAD
22h
6 min read

राजेश मेहरा


राष्ट्रीय जनता दल के साथ रहते हुए उसी को चुनौती क्यों दे रही कांग्रेस?


बिहार में 23 अक्टूबर को विधान परिषद की आठ सीटों पर चुनाव होने हैं। इन चुनावों से न तो विधानसभा की तस्वीर

बदलेगी, न मंत्रिमंडल पर असर पड़ेगा और न ही यह तय होगा कि राज्य में किसकी सरकार बनेगी। ये विधान परिषद के

शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र हैं, जहां सीमित मतदाता ही वोट डालते हैं। इनमें पंजीकृत शिक्षक और डिग्रीधारक

शामिल हैं। मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 16 नवंबर को खत्म हो रहा है। यही वजह है कि इन चुनावों में कांग्रेस के उतरने

का तरीका महत्वपूर्ण है। वह अपनी अलग पहचान बनाने के लिए गठबंधन की एकता को जोखिम में डालने को तैयार

दिख रही है।


राष्ट्रीय जनता दल ने पहले कदम उठाया। सितंबर की शुरूआत में उसने आठ में से छह सीटों पर उम्मीदवारों के नाम

घोषित कर दिए। दो सीटें छोड़ दी गईं। इनमें दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल था, जिसका प्रतिनिधित्व कांग्रेस के

मौजूदा विधान परिषद सदस्य और पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा करते हैं। दूसरी सीट तिरहुत शिक्षक

निर्वाचन क्षेत्र थी, जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पास है। सीटों के बंटवारे को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई थी। एक

अक्टूबर को कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने राष्ट्रीय जनता दल के इस कदम का जवाब दिया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के

महासचिव (संगठन) के. सी. वेणुगोपाल की मंजूरी से जारी सूची में कांग्रेस ने पांच उम्मीदवार उतारे। मदन मोहन झा को

फिर से दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से टिकट दिया गया। संजय यादव को पटना शिक्षक, असदुल्लाह खान को पटना

स्नातक, रजनीकांत पाठक को दरभंगा स्नातक और मनोज कुमार जायसवाल को कोसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार

बनाया गया। इनमें से तीन स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों और पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में राष्ट्रीय जनता दल पहले ही अपने

उम्मीदवार उतार चुकी थी। कांग्रेस की सूची आने के बाद राष्ट्रीय जनता दल ने मदन मोहन झा के खिलाफ भी कुमार राय

को मैदान में उतार दिया। अब आठ में से पांच सीटों पर दोनों सहयोगी दल आमने-सामने हैं।

इसके उलट, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने आठों सीटों का बंटवारा साफ तौर पर कर लिया। भारतीय जनता पार्टी और

जनता दल (यूनाइटेड) को चार-चार सीटें मिलीं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम का कहना है कि दोनों दलों के बीच

कोई मतभेद नहीं है। असली लड़ाई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से है और उम्मीदवारों की सूची पार्टी कार्यकताओं की

भावना को दशार्ती है। राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं का कहना है कि वामपंथी दल, कांग्रेस और उनकी पार्टी लंबे समय से

स्नातक, शिक्षक और स्थानीय निकायों के चुनाव अलग-अलग लड़ते रहे हैं।

दोनों बातें सही हो सकती हैं, लेकिन इससे असली मुद्दा खत्म नहीं होता। विधान परिषद की किसी सीट पर सहयोगी दलों

के बीच दोस्ताना मुकाबला छोटी बात है। लेकिन जब बड़ा सहयोगी दल अपनी सूची पहले ही जारी कर चुका हो, तब

उसके बाद उसी सीट पर उम्मीदवार उतारने का फैसला करना और उस फैसले को दिल्ली से मंजूरी मिलना अलग बात है।

बिहार में कांग्रेस करीब दो दशक से राष्ट्रीय जनता दल के पीछे चलती रही है। कांग्रेस का संगठन लगातार कमजोर होता

गया, जबकि राष्ट्रीय जनता दल के पास मुस्लिम यादव मतदाताओं का आधार था और विपक्ष का नेतृत्व करने का दावा

भी। यह समझौता तब तक चलता रहा, जब तक राष्ट्रीय जनता दल सत्ता तक पहुंचने का एकमात्र मजबूत जरिया दिखाई

देती रही। लेकिन अब स्थिति वैसी नहीं है।


नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल को बड़ा झटका लगा। 2020 में 75 सीटें जीतने वाली पार्टी इस

बार सिर्फ 25 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस की सीटें भी 19 से घटकर छह रह गईं। अब 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा

में महागठबंधन के पास करीब 35 सीटें हैं। इस कमजोरी में पहली खुली दरार मार्च में दिखी। 16 मार्च को राज्यसभा की

पांच सीटों के लिए चुनाव हुआ। पहली वरीयता के मतों से जीतने के लिए 41 वोटों का आंकड़ा जरूरी था। विपक्ष के पास

अपने 35 विधायक थे। इसके अलावा ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और बहुजन समाज पार्टी के एकमात्र

विधायक का समर्थन मिलने की उम्मीद थी। इस तरह विपक्ष एक सीट जीतने की स्थिति में पहुंच सकता था। उसने राष्ट्रीय

जनता दल के मौजूदा राज्यसभा सदस्य अमरेंद्र धारी सिंह को दोबारा उम्मीदवार बनाया।

चार विधायकों ने वोट नहीं डाला। इनमें वाल्मीकिनगर से कांग्रेस विधायक सुरेंद्र कुशवाहा, फारबिसगंज से मनोज

बिस्वास और मनिहारी से मनोहर प्रसाद शामिल थे। चौथे विधायक राष्ट्रीय जनता दल के ढाका से विधायक फैसल

रहमान थे। अमरेंद्र धारी सिंह को पहली वरीयता के 37 वोट मिले। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने पांचों सीटें जीत लीं।

इनमें भारतीय जनता पार्टी के शिवेश कुमार की पांचवीं सीट भी शामिल थी। कांग्रेस ने अनुपस्थित विधायकों को कारण

बताओ नोटिस जारी किए। इन विधायकों ने अपनी-अपनी सफाई दी। इनमें यह दलील भी शामिल थी कि राष्ट्रीय जनता

दल ने उन्हें महत्व नहीं दिया और प्रदेश अध्यक्ष का संदेश भेजना बातचीत का विकल्प नहीं हो सकता।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने कांग्रेस पर जीत सकने वाली सीट का वोट बर्बाद करने का आरोप

लगाया। विधायकों के निजी कारण चाहे जो रहे हों, नतीजा सबके सामने था। गठबंधन अपने ही साझा उम्मीदवार के

लिए अपने विधायकों के वोट सुनिश्चित नहीं कर पाया। मौजूदा विधान परिषद चुनाव उसी खींचतान का अगला अध्याय

हैं, लेकिन यहां दांव कम हैं। बिहार के स्नातक निर्वाचन क्षेत्र कांग्रेस के उस सामाजिक आधार का हिस्सा हैं, जिसे वह अब

भी अपना मानती है। यह शहरी और शिक्षित मतदाताओं का वर्ग है, जिसे वह राष्ट्रीय जनता दल से उधार लिया हुआ

आधार नहीं मानना चाहती।

राष्ट्रीय जनता दल की ओर से पहले ही दावा की जा चुकी सीटों पर उम्मीदवार उतारना इसी वर्ग के बीच अपनी मौजूदगी

दर्ज कराने की कोशिश है, न कि सरकार गिराने की। तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र औपचारिक रूप से भारतीय कम्युनिस्ट

पार्टी के लिए छोड़ दिया गया। हालांकि, वहां कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा दाखिल

किया। इससे पता चलता है कि कांग्रेस अपनी दावेदारी पेश तो कर रही है, लेकिन गठबंधन के भीतर उसकी यह कोशिश

सीमित है। राष्ट्रीय जनता दल ने इसका जवाब देते हुए उस सीट पर भी उम्मीदवार उतार दिया, जहां मौजूदा सदस्य

कांग्रेस का है। सिर्फ 25 विधायकों तक सिमट जाने के बावजूद राष्ट्रीय जनता दल विधान परिषद को अब भी अपना क्षेत्र

मानती दिख रही है। वहीं छह विधायकों वाली कांग्रेस ने तय किया है कि बची हुई सीटें स्वीकार करने से बेहतर है कि ऐसे

चुनाव में वोट बंटने का जोखिम उठाया जाए, जिसका विधानसभा के समीकरणों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

दोनों दल अब भी महागठबंधन में हैं। लेकिन गठबंधन में सहयोगी दल के पीछे चलने की व्यवस्था सबसे पहले उन्हीं

चुनावों में कमजोर पड़ती है, जहां सत्ता का फैसला नहीं होना होता। ऐसे चुनावों में छोटे सहयोगी दल के पास यह परखने

का मौका होता है कि क्या उसका अपना संगठन अब भी चुनावी ताकत रखता है। 23 अक्टूबर के बाद जो भी नतीजा

आएगा, उससे सत्ता पक्ष की सीटों में कोई बदलाव नहीं होगा। लेकिन दोनों दलों को एक ऐसा आंकड़ा जरूर मिलेगा,

जिसका इस्तेमाल वे आगे कर सकते हैं। स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या इतनी कम है कि वोटों

का हिसाब आसानी से लगाया जा सकता है। साथ ही, ये मतदाता मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों से आते हैं।

कांग्रेस इन्हें अपना आधार बताना चाहती है। अगर उसके उम्मीदवार राष्ट्रीय जनता दल के प्रत्याशियों के मुकाबले अच्छा

वोट हासिल करते हैं, तो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को अगली बार सीटों के बंटवारे पर बातचीत के लिए नया तर्क मिल

सकता है। यह बातचीत किसी उपचुनाव, राज्यसभा की खाली होने वाली सीट या लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों

की सूची को लेकर हो सकती है। अगर कांग्रेस उम्मीदवारों को खास समर्थन नहीं मिलता, तो राष्ट्रीय जनता दल का पुराना

तर्क फिर मजबूत होगा। उसके मुताबिक बिहार में कांग्रेस के पास झंडा तो है, लेकिन चुनाव लड़ने वाला मजबूत संगठन

नहीं। पार्टी यह भी कह सकती है कि 16 मार्च को कांग्रेस विधायकों का वोट डालने नहीं पहुंचना कोई अपवाद नहीं,

बल्कि एक आदत है।

दोनों में से कोई भी नतीजा आए, महागठबंधन कागजों पर तो बना रहेगा, लेकिन व्यवहार में उसकी एकजुटता और

कमजोर होगी। विधानसभा में 200 से ज्यादा सीटों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को सरकार चलाने के लिए वोटों

के बंटवारे की जरूरत नहीं है। उसे सिर्फ इतना चाहिए कि विपक्ष यह साबित करता रहे कि जिन चुनावों का सत्ता पर

कोई असर नहीं पड़ता, उनमें भी वह एकजुट होकर मुकाबला नहीं कर सकता।

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page