भाजपा को मिली और ताकत


रामावतार सिंह
संसद हर साल विभागों से संबंधित स्थायी समितियों का पुनर्गठन करती है। कुछ अध्यक्ष अपने पद पर बने रहते हैं, कुछ की जगह दूसरे लोग आ जाते हैं और राजनीतिक दल अगले मुकाबले की तैयारी में जुट जाते हैं। अब तक यह एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती थी। लेकिन 3 अक्टूबर को संसद के दोनों सचिवालयों से जारी बुलेटिन, जिनमें 26 सितंबर से नई समितियों के गठन की जानकारी दी गई थी, अपने भीतर एक खास संदेश लिए हुए थे। इसका असर सबसे पहले तृणमूल कांग्रेस पर पड़ा, क्योंकि चोट उस चीज से लगी जो सूची में थी ही नहीं। लगातार दो साल तक पार्टी के पास दो स्थायी समितियों की अध्यक्षता थी। नई सूची में 24 अध्यक्ष हैं, लेकिन इनमें से एक भी पद तृणमूल कांग्रेस के पास नहीं है। डोला सेन अब वाणिज्य संबंधी संसदीय स्थायी समिति की अध्यक्ष नहीं हैं। इस समिति की अध्यक्षता अब भाजपा के सुधांशु त्रिवेदी के पास है। कीर्ति आजाद भी अब रसायन और उर्वरक संबंधी स्थायी समिति के अध्यक्ष नहीं हैं। यह जिम्मेदारी काकोली घोष दस्तीदार को दी गई है।
यही दूसरा नाम यानी घोष दस्तीदार इस पूरे फेरबदल को एक बड़ी राजनीतिक कहानी बना देता है। इसे समझने के लिए मई की घटनाओं पर नजर डालनी होगी। तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा से हार गई थी। इसके कुछ ही हफ्तों के भीतर तृणमूल कांग्रेस का संसदीय दल भी बिखरने लगा। 27 मई को घोष दस्तीदार ने पार्टी में अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। 14 जून को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से उनके आवास पर मुलाकात के बाद उन्होंने घोषणा की कि तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद, यानी पार्टी की दो-तिहाई से ज्यादा संख्या, एक अनजानी सी पार्टी नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हो रहे हैं और सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का समर्थन करेंगे।

तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने लोकसभा में अलग बैठने की मांग की। अध्यक्ष बिरला ने संसद के मानसून सत्र के लिए उन्हें अलग सीटें आवंटित कर दीं। तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी ने संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत इन सभी 20 सांसदों को अयोग्य ठहराने की याचिकाएं दाखिल कीं। उन्होंने 27 जुलाई को बिरला को पत्र लिखा, 12 अगस्त को उनसे मुलाकात की और इसके बाद समयबद्ध फैसला लेने की मांग को लेकर उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 25 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इन 20 सांसदों को नोटिस जारी किया।
वहीं लोकसभा अध्यक्ष ने भी अपने स्तर पर नोटिस जारी किए और तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों को जवाब देने का समय दिया। कभी लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के सदन नेता रहे और अब इन 20 सांसदों में शामिल सुदीप बंद्योपाध्याय को 22 सितंबर तक जवाब देने का समय दिया गया।
इस समयसीमा के खत्म होने के चार दिन बाद स्थायी समितियों का पुनर्गठन कर दिया गया। बगावत की अगुवाई करने वाली घोष दस्तीदार उस समिति की अध्यक्ष बन गईं, जिसकी अध्यक्षता 2024 से तृणमूल कांग्रेस के पास थी। यानी एक तरफ पार्टी उन्हें सदन से बाहर कराने की कोशिश कर रही थी, दूसरी तरफ उन्हें उसी सदन की एक समिति की अध्यक्षता दे दी गई।
यह ऐसा घटनाक्रम नहीं है, जिसे ममता बनर्जी नजरअंदाज कर सकती हैं। यह उनके सांसदों पर पार्टी के सबसे बुनियादी दावे से जुड़ा मामला है। ममता ने बिरला को पत्र लिखा। उनके जवाब में दो बातें कही गईं। पहली, घोष दस्तीदार के खिलाफ अयोग्यता की याचिका लंबित है। दूसरी, डिजिटल संसद की वेबसाइट पर अभी भी सभी 28 सांसदों को तृणमूल कांग्रेस का सदस्य बताया गया है। घोष दस्तीदार वास्तव में नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया की सदस्य हैं या नहीं, इस सवाल का जवाब बिरला ने अभी नहीं दिया है।
तृणमूल कांग्रेस ने लिखित रूप से लोकसभा की एक समिति अपने पास रखने और मौजूदा अध्यक्ष को ही जारी रखने की मांग की थी। बिरला ने कहा कि नियुक्ति में न तो इस आपत्ति को माना गया और न ही पार्टी के नामांकन को। तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ'ब्रायन ने राज्यसभा में वाणिज्य संबंधी स्थायी समिति के खोने का मुद्दा उठाया। राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है और डोला सेन दो साल तक इस समिति की अध्यक्ष रही थीं।

आपत्तियों को दर्ज तो किया गया, लेकिन कुछ नहीं बदला। सरकार को तृणमूल कांग्रेस से दोनों समितियां लेने की जरूरत
नहीं थी। उसने एक समिति अपने पास ले ली, यानी वाणिज्य संबंधी स्थायी समिति।
दूसरी समिति उसने ऐसे नेता को दे दी, जिसे तृणमूल कांग्रेस न तो पार्टी से निकाल सकती है और न ही नियंत्रित कर सकती है। दोनों ही मामलों में समिति की अध्यक्षता तृणमूल कांग्रेस के हाथ से निकल गई है। लेकिन दूसरे मामले यानी रसायन और उर्वरक समिति में ऐसा उसकी अपनी बगावत के कारण हुआ है। अब घोष दस्तीदार जिस बैठक की अध्यक्षता करेंगी, वह इस पूरे घटनाक्रम की याद दिलाएगी।
इन सबमें भाजपा को हुए फायदे को समझना ज्यादा आसान है। वाणिज्य संबंधी स्थायी समिति इनमें सबसे महत्वपूर्ण है। अब इस समिति का काम सिर्फ एक मंत्रालय तक सीमित नहीं है। शुल्क, व्यापार वार्ता, निर्यात, आपूर्ति श्रृंखला और मुक्त व्यापार समझौते राष्ट्रीय रणनीति से जुड़े मुद्दे बन चुके हैं।
अमेरिका, यूरोप और चीन के साथ भारत के संबंध भी इन सभी मुद्दों से जुड़े हैं। अगले एक साल में सरकार को सबसे मुश्किल सवालों का सामना यहीं करना होगा। और अब इस समिति की अध्यक्षता उसके अपने एक नेता के पास है।
अन्य स्थायी समितियों में सुधीर गुप्ता ने सी.एम. रमेश की जगह रेलवे संबंधी समिति के अध्यक्ष का पद संभाला है। शशांक मणि श्रम, वस्त्र और कौशल विकास संबंधी समिति के अध्यक्ष हैं। सुजीत कुमार ने कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय संबंधी समिति की अध्यक्षता बृजलाल से संभाल ली है।
पुराने चेहरे भी बने हुए हैं। राधा मोहन सिंह रक्षा संबंधी समिति के अध्यक्ष बने हुए हैं, जिसकी अध्यक्षता वह 2024 से कर रहे हैं। भर्तृहरि महताब वित्त संबंधी समिति की अध्यक्षता जारी रखेंगे और राधा मोहन दास अग्रवाल गृह मामलों की समिति के अध्यक्ष बने रहेंगे।
निशिकांत दुबे संचार और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी समिति के अध्यक्ष बने हुए हैं। अनुराग ठाकुर कोयला, खान और इस्पात संबंधी समिति के अध्यक्ष बने रहेंगे, जबकि राजीव प्रताप रूडी जल संसाधन संबंधी समिति की अध्यक्षता करते रहेंगे।
अगर स्थायी समितियों के नामों को एक साथ रखकर देखें तो तस्वीर साफ हो जाती है। वित्त, गृह, रक्षा, वाणिज्य, सूचना प्रौद्योगिकी, रेलवे, कोयला और इस्पात। सरकार के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक, सुरक्षा और बुनियादी ढांचे से जुड़े कामकाज पर नजर रखने वाली समितियों की अध्यक्षता सत्तारूढ़ भाजपा के पास है।
यह सूची का एक पहलू है। दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कांग्रेस के पास महत्वपूर्ण समितियों की अध्यक्षता बनी हुई है। शशि थरूर विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष बने हुए हैं, चरणजीत सिंह चन्नी कृषि संबंधी समिति के और मुकुल वासनिक शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी समिति के अध्यक्ष हैं। सप्तगिरि शंकर उलाका ग्रामीण विकास और पंचायती राज संबंधी समिति की अध्यक्षता जारी रखेंगे।

समाजवादी पार्टी के राम गोपाल यादव स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी समिति के अध्यक्ष बने हुए हैं। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के पास भी दो महत्वपूर्ण समितियां हैं। तिरुचि शिवा उद्योग संबंधी समिति के अध्यक्ष हैं, जबकि के. कनिमोझी उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण संबंधी समिति की अध्यक्ष हैं।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक दलों को भी उनका हिस्सा मिला है। जनता दल (यूनाइटेड) के संजय झा परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी समिति के अध्यक्ष बने हुए हैं। शिवसेना के श्रीरंग बारणे ऊर्जा संबंधी समिति के अध्यक्ष हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सुनील तटकरे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस संबंधी समिति की अध्यक्षता कर रहे हैं।
महत्वपूर्ण समितियों की अध्यक्षता विपक्षी दलों और सहयोगी दलों को देने की पुरानी परंपरा कायम है। लेकिन इसके भीतर का गणित बदल गया है। भाजपा पहले से मजबूत है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने अपनी जगह बनाए रखी है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी दलों को भी उनका स्थान मिला है। क्षेत्रीय दल अपने अपने समझौते करते जा रहे हैं। लेकिन एक पार्टी पूरी तरह बाहर हो गई है और संयोग से वही पार्टी है, जिसमें हुआ विभाजन सरकार के लिए काम करना आसान बनाता है।
यह सब क्यों मायने रखता है? आखिर ये सिर्फ दो समितियां हैं, जिनके बारे में शायद ज्यादातर मतदाता ज्यादा नहीं जानते। इसकी वजह है कि समिति का अध्यक्ष क्या तय करता है। संसदीय स्थायी समिति कोई पार्टी बैठक नहीं होती। इसके 31 सदस्य होते हैं, जिनमें 21 लोकसभा और 10 राज्यसभा से आते हैं।
ये सदस्य सदन के अलग-अलग दलों से होते हैं और समिति की रिपोर्ट सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होती। लेकिन अध्यक्ष यह तय करता है कि समिति किन मुद्दों पर चर्चा करेगी, बैठक कब होगी, किसे गवाही देने के लिए बुलाया जाएगा और उस गवाही की जांच किस तरह की जाएगी। ये फैसले रिपोर्ट को आकार देते हैं। और रिपोर्ट सदन के बाहर होने वाली बहस को दिशा देती है।
ऐसी संसद में, जहां विधेयक एक दोपहर में पारित हो सकते हैं और सदन में बहस कई बार महज प्रदर्शन बन जाती है, समिति कक्ष एक ऐसी चीज देता है, जो सदन नहीं देताः समय। बारीकी से पढ़ने का समय, अधिकारियों को बुलाने का समय और ऐसे सवाल पूछने का समय, जिन्हें शोर में दबाया नहीं जा सकता।
इसीलिए समितियों की अध्यक्षता हमेशा से संसदीय शक्ति की एक अहम लेकिन शांत मुद्रा रही है। और यही वजह है कि यह फेरबदल महत्वपूर्ण है। सरकार ने किसी को चुप कराए बिना संस्थागत स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत की है। जब मुश्किल मुद्दे सामने आएंगे, और वे आने वाले हैं, तब सरकार उन ज्यादातर कमरों की अध्यक्षता कर रही होगी, जहां इन मुद्दों की जांच होगी।
वाणिज्य समिति में शुल्क और व्यापार समझौतों पर चर्चा होगी। रक्षा समिति में सैन्य खरीद और तैयारियों का मुद्दा होगा। सूचना प्रौद्योगिकी समिति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने से जुड़ी उलझनों पर चर्चा होगी। वित्त समिति
अर्थव्यवस्था की स्थिति से जुड़े हर तर्क के केंद्र में होगी। और इन चारों समितियों की अध्यक्षता भाजपा के पास है।
फिर भी समिति की अध्यक्षता करने वाली हर दूसरी पार्टी के सामने यहां कुछ साबित करने की चुनौती है। कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और समाजवादी पार्टी के पास ऐसे मंच हैं, जहां वे सरकार से विस्तार से सवाल पूछ सकती हैं। उन्हें तय करना होगा कि इन मंचों का इस्तेमाल उस उद्देश्य के लिए किया जाए या समिति की बैठकों को बाहर पहले से चल रहे नारों के एक और मंच में बदल दिया जाए।
भाजपा के सामने इसके उलट समस्या है। ज्यादा समितियों की अध्यक्षता का मतलब यह भी है कि समितियों की विश्वसनीयता को संस्थानों के रूप में बनाए रखने की ज्यादा जिम्मेदारी होगी, ताकि वे सत्तापक्ष के विस्तार की तरह न दिखें।
तृणमूल कांग्रेस की समस्या अलग तरह की है। उसने दो अध्यक्ष पद खो दिए हैं। यह दिखाई देने वाली चोट है। इससे भी गहरी समस्या उसके बागी सांसदों की अनिश्चित स्थिति है और घोष दस्तीदार की नियुक्ति ने इसे छिपाना और मुश्किल कर दिया है।
जिस नेता का पार्टी नेतृत्व के साथ संबंध खुले तौर पर विवाद में है, उसके पास अब संसद में एक औपचारिक पद है, जो खुद पार्टी के पास नहीं है। लोकसभा अध्यक्ष का फैसला आने तक यही स्थिति है। जब भी फैसला आएगा, उसके असर समिति की अध्यक्षताओं से कहीं आगे तक जाएंगे। फिलहाल चुपचाप एक मिसाल बन रही है। किसी राज्य की राजधानी में किसी पार्टी को विभाजित किया जा सकता है और दिल्ली में उसे संस्थागत रूप दिया जा सकता है।
इसके पीछे एक बड़ी कहानी भी है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के विपक्ष का स्वरूप बदला है। भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन चुनावों के लिए अलग-अलग दलों को एक साथ लाया, लेकिन उसने उन्हें कभी एक संसदीय संगठन में नहीं बदला। दरअसल राज्यों के हित अपनी जगह कायम हैं। क्षेत्रीय दल अपना अलग हिसाब रखते हैं। स्थानीय दबाव के कारण गठबंधन अपना रुख बदलते रहते हैं और कभी-कभी टूट भी जाते हैं।
स्थायी समितियों की सूची ने इसे कागज पर उतार दिया है। सदन में भाजपा अब भी सबसे प्रभावशाली ताकत है। लेकिन उसके आसपास का राजनीतिक दायरा अब एक गठबंधन के सामने एकजुट विपक्ष जैसा नहीं है।
यह क्षेत्रीय हितों, अलग-अलग राजनीतिक गणनाओं और पश्चिम बंगाल के मामले में एक ही पार्टी के नाम को लेकर लड़ रहे दो गुटों का बिखरा हुआ समूह है। सरकार ने इस बिखराव को सही तरीके से पढ़ा और उसका इस्तेमाल किया।
स्थायी समितियों के कमरों में भाजपा की स्थिति मजबूत हुई है। कांग्रेस और दक्षिण की पार्टियों ने अपनी जगह बनाए रखी है। तृणमूल कांग्रेस को किनारे कर दिया गया है और उसके ही एक बागी नेता उस कुर्सी पर बैठे हैं, जो कभी पार्टी के पास थी।
यानी पश्चिम बंगाल से शुरू हुआ विवाद अब नई दिल्ली में एक औपचारिक जगह तक पहुंच गया है। संसद के भीतर सत्ता का समीकरण बदल रहा है और स्थायी समितियां इसकी झलक दिखाने लगी हैं।
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